अष्टांग योग – महर्षि पतंजलि द्वारा योग के 8 अंग बताए गए हैं जिनका उन्होंने विस्तार से विवरण दिया है। योग पर यूं तो बहुत से ग्रंथ और पुस्तकें लिखी गई हैं पर उनमें से सबसे प्राचीन और सबसे अधिक विश्वसनीय पतंजलि योग सूत्र को माना गया है क्योंकि उन्होंने हजारों साल पहले जिस वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखा है वह वास्तव में बहुत आश्चर्यजनक है क्योंकि ये दर्शाता है कि जब अन्य सभ्यताएं जन्म ले रही थीं तब भारत की सभ्यता उन्नत अवस्था में थी। श्री पतंजलि का व्याकरण, औषधि और योग पर अद्भुत योगदान है।
पूरा अष्टांग योग को एक लेख में समाहित करना तो संभव नहीं, लेकिन मैंने कोशिश की है कि मैं बहुत प्रकार की उपयोगी जानकारी पाठकों को दे सकूं।
योग का अर्थ है शरीर, मस्तिष्क और आत्मा का परमात्मा से मिलन। आजकल के आधुनिक जीवन में आसन, ध्यान और प्राणायाम ही ज्यादा प्रसिद्ध हैं, लेकिन अष्टांग योग के बाकी अंग भी उतने ही जरूरी हैं क्योंकि ये एक चरणबद्ध प्रक्रिया है। बिना यम और नियम के आसन और प्राणायाम के पूर्ण अच्छे परिणाम नहीं पा सकते और न अगले चरण की ओर बढ़ा जा सकता है।
योग (Ashtanga Yoga) 8 अंग इस प्रकार है:-
- यम – Ethics or Moral restraints (e.g. non-violence, truthfulness)
- नियम (संयम)- Discipline or Personal observances (e.g., cleanliness, contentment)
- आसन (स्थिरता)- Postures or Physical poses for stability and comfort
- प्राणायाम (प्राण की स्थिरता)- Control of breath and life force
- प्रत्याहार (वृत्ति की निराकार)- Withdrawal or Turning senses inward
- धारणा (चित्त की वृत्ति)- Focus Concentration on a single point
- ध्यान (चित्त की स्थिरता)- Meditation Uninterrupted flow of meditation
- समाधि (चित्त की स्थिरता)- Liberation Blissful absorption and union with the Self
यम
अहिंसा (Non-Violence): योग का पहला यम है अहिंसा, किसी भी शारीरिक और मानसिक हिंसा को छोड़ना।
सत्य (Truthfulness): यम का दूसरा अंग है सत्य, अपने जीवन के हर पक्ष में सत्य का पालन करना।
अस्तेय (Non-Stealing): इसका अर्थ सिर्फ धन की चोरी न करना है नहीं बल्कि अपने मन, वचन तथा कर्म से से भी किसी ओर की संपत्ति को हासिल ना करना ही अस्तेय हैं।
ब्रह्मचर्य (Celibacy): ब्रह्मचर्य का मतलब है ब्रह्मा की ओर प्रवृत्त होना। इससे व्यक्ति अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करता है और आत्मा की ऊर्जा को ब्रह्मा की ओर प्रवृत्त करता है।
अपरिग्रह (Non-Possessiveness): योगी को स्वार्थी और लोभी नहीं बनने के लिए अपरिग्रह का पालन करना चाहिए। इससे उसे आत्मसमर्पण और संयम की भावना मिलती है।
नियम: आधार आत्म-शोध का
- शौच (Purity): योगी को शरीर, मन, और आत्मा की पवित्रता बनाए रखने के लिए शौच का पालन करना चाहिए। यह उसे आत्म-शोध और स्वयं को पवित्र बनाए रखने में मदद करता है।
- संतोष (Contentment): संतोष आवयशक है क्योंकि यह योगी को आत्मा की सन्तुलन स्थिति में रहने के लिए उत्साहित करता है।
- तपस् (Austerity): तपस्या योगी को शरीर, मन, और आत्मा की शुद्धि के लिए समर्पित करती है।
- स्वाध्याय (Self-Study): नियम में स्वाध्याय से तात्पर्य स्वयं की अध्ययन और समीक्षा से है, जिससे योगी अपनी गलतियों को सुधार सकता है और आत्मसमर्पण में बढ़ सकता है।
- ईश्वर-प्रणिधान (Surrender to God): यह योगी को ईश्वर के सामर्थ्य, न्याय, और दया में विश्वास दिलाता है। यह उसे आत्म-समर्पण में ले जाता है और आत्मा के साथ दिव्य एकता की प्राप्ति होती है।
आसन
पतञ्जलि के योगसूत्र के अनुसार,
” स्थिरसुखमासनम् “
(अर्थ :- सुखपूर्वक स्थिरता से बैठने का नाम आसन है। या, जो स्थिर भी हो और सुखदायक अर्थात् आरामदायक भी हो, वह आसन है। )
प्राणायाम
प्राण अर्थात श्वास को शरीर में भीतर लेना और छोड़ना तथा रोक कर रखने की संतुलित प्रक्रिया को प्राणायाम कहते हैं।
- पूरक (श्वास लेना)
- कुंभक (श्वास रोकना)
- रेचक (श्वास छोड़ना)
प्रत्याहार (वृत्ति की निराकार)
इन्द्रियों को बाहरी आकर्षण से विमुख कर आंतरिकता की ओर मोड़ना।
धारणा (चित्त की वृत्ति)- Focus Concentration on a single point
किसी भी मनुष्य का सभी बाहरी कार्यों से विरक्त होकर किसी एक कार्य में लीन हो जाना ही ध्यान है
समाधि (चित्त की स्थिरता)- Liberation Blissful absorption and union with the Self
जब चित पूरी तरह आत्मा में समाहित हो जाता हैं उसे ही ध्यान कहते हैं।
योग सूत्र में 4 अध्याय है :
समाधि पाद (Samadhi Pada)
साधना पाद (Sadhna Pada)
विभूति पाद (Vibhuti Pada)
कैवलया पाद (Kaivalya Pada)
समाधि पाद (Samadhi Pada)
इसमें श्री पतंजलि ने सबसे समाहित चित वाले सबसे उत्तम अधिकारीयों के लिए सबसे प्रथम समाधी पाद को आंरभ करके उसमे योग के स्वरुप का वर्णन किया है। या कहे की जो साधक बहुत उच्च आध्यात्मिक श्रेणी में पहले ही है उनके लिए ये समाधी का मार्ग है। ऐसे साधक बहुत दुर्लभ है।
कुछ मुख्य सूत्र
- योगश्चित्तवृत्ति निरोधः
योग चित्त की वृत्तियों को रोकना है।
- तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्
तब दृष्टा अपने ही शुद्ध रूप में अवस्थित हो जाता है।
- वृत्ति सारूप्यमितरत्र
दूसरी अवस्था में दृष्टा वृति के सामान रूप वाला प्रतीत होता है।
साधना पाद (Sadhna Pada)
यह अध्याय उन साधको के लिए है जो आध्यात्मिक उन्नति चाहते है और प्रारंभिक अवस्था में है। इसी अध्याय में क्रिया योग का विवरण मिलता है। जिसमे योग के 8चरण बतायें गए है। इसमें तीन श्रेणी है। प्रथम श्रेणी में यम, नियम ,आसन, प्राणायाम तापस के अंतर्गत आता है। दूसरी श्रेणी में प्रत्याहार,धारणा स्वाध्याय के अंतर्गत आता है। तीसरी श्रेणी में ध्यान और समाधि ईश्वर परिधान के अंतर्गत आता है। इस प्रकार श्री पातंजलि इसमें कर्म योग ,भक्ति योग और ज्ञान योग के बारे में प्रकाश डालते है।
पतंजलि ने साधना पाद के सूत्र संख्या में अष्टांग योग को विस्तार से समझाया है, वे कहते हैं:
“यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यान समाधयोऽष्टावङ्गानि”
विभूति पाद( Vibhuti Pada)
ध्यान ,धारणाऔर समाधि तीनो मिलकर संयम बनाते है और जहाँ समाधी पाद में साधना की बाहरी खोज (External quest )की पर जोर दिया जाता है। विभूति पाद में में साधना की आतंरिक खोज (Internal Quest) पर जोर दिया जाता है। इसमें साधक ध्यान (Meditation) , धारणा (Concentration) और समाधि के द्वारा योग मार्ग पर अगले चरण की ओर बढ़ते है। इसी अध्याय में में ही साधक को सिद्धियां प्राप्त होती है।
अष्टसिद्धि का विवरण
- अणिमा – अपने शरीर को एक अणु के समान छोटा कर लेने की क्षमता।
- महिमा – शरीर का आकार अत्यन्त बड़ा करने की क्षमता।
- गरिमा – शरीर को अत्यन्त भारी बना देने की क्षमता।
- लघिमा – शरीर को भार रहित करने की क्षमता।
- प्राप्ति – बिना रोक टोक के किसी भी स्थान को जाने की क्षमता।
- प्राकाम्य – अपनी प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करने की क्षमता।
- ईशित्व – प्रत्येक वस्तु और प्राणी पर पूर्ण अधिकार की क्षमता।
- वशित्व – प्रत्येक प्राणी को वश में करने की क्षमता।
शरीर के कोश (Sheaths of Body:-
- अन्नमय कोश ( Physical body)
- प्राणमय कोश ( Breath body)
- मनोमय कोश (Mind body)
- विज्ञानमय कोश (Intellectual body)
- आनंदमय कोश ( Bliss body)
- आनंदमय कोश – यह शुद्ध आत्मतत्व चित्त पर पहला आवरण हैं। इसको आनंदमय कोश कहते हैं। आनंदमय कोश आपकी शरीर की सबसे शुद्ध अवस्था है और यह चारों कोशों का स्वामी होता है। सुख, शांति और आनंद की अनुभूति इसी कोश के जरिये होती है। इसलिए, इसके पोषण के लिए चेतना और जागरुकता की आवश्यकता होती है।
- विज्ञानमय कोश – यह आनंदमय कोश के ऊपर दूसरा आवरण हैं। यह दूसरा आवरण अंहकार और बुद्धि का हैं, इसको ही विज्ञानमय कोश कहा जाता हैं। आपकी बुद्धि, आपका ज्ञान सभी इसी कोश से जुड़े होते हैं। आपके जीवन का हर प्रकार का निर्णय, दंद्व, अहंकार सभी इसी कोश की देन होती है। इसे स्वस्थ रखने के लिए ध्यान किया जाता है ताकि आप अपने अंतर्ज्ञान से परिचित हो सकें।
- मनोमय कोश – विज्ञानमय कोश के ऊपर जो तीसरा आवरण हैं उसे ही मनोमय कोश कहा जाता है। मनोमय कोश मन और 5 ज्ञानेन्द्रियो से बना हैं।
- प्राणमय कोश – मनोमय कोश के ऊपर जो चौथा आवरण हैं । उसे प्राणमय कोश कहते हैं। जो की 5 प्राण और 5 कर्मेन्द्रियों से बना हैं जिसे प्राणमय कोश कहते हैं।
- अन्नमय कोश – प्राणमय कोश कोश के ऊपर जो पाचँवा आवरण हैं ,उसे अन्नमय कोश कहते हैं। यह अन्न से बनता हैं और अन्न से ही बढ़ता हैं। इसलिए इसको अन्नमय कोष कहा जाता हैं। अन्नमय कोश आपका ऊपरी भौतिक शरीर है जो आपको दिखाई देता है। इसे अन्नमय इसलिए कहा गया है क्योंकि इसे पोषण देने के लिए आप भोजन ग्रहण करते हैं। शरीर के अंदर जो भी रक्त, मांस, मज्जा, हड्डी है यानि आपका भौतिक शरीर जिन चीजों से बना है, वो सब अन्नमय कोश में आते हैं अन्नमय कोश सभी कोशों का आधार हैं क्योंकि बाकी सभी कोश इसके अंदर समाहित है।
कैवलया पाद (Kaivalya Pada )
इस अध्याय चार है और अंतिम भी है इसमें कैवल्य की उपयोगी चित्त तथा उसे सम्बंधित जो शंकाये हो सकती है उनका निवारण हैं। इसमें पतंजलि वैराग्य और विरक्ति मार्ग का विवरण देतें हैं।
समाधि पाद Samadhi Pada – भक्ति मार्ग
साधना पाद Sadhna Pada– कर्म मार्ग
विभूति पाद Vibhuti Pada –ज्ञान मार्ग
कैवलया पाद Kaivalya Pada – वैराग्य मार्ग
Conclusion :–
प्रश्न अष्टांग योग पतंजलि योगसूत्र के किस अध्याय में सम्मिलित हैं।
उत्तर
पतंजलि ने साधना पाद के इस सूत्र में अष्टांग योग का विवरण दिया हैं :-
“यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यान समाधयोऽष्टावङ्गानि”
प्रश्न पातंजलि सूत्र को कैसे पढ़े?
उत्तर
पतंजलि के सभी सूत्रों को समझने के लिए आपको सूत्र विस्तृत विश्वसनीय टीका या अनुवाद व्याख्याओं के साथ पड़ने होंगे ।
प्रश्न क्या आसान प्राणायाम के लिए योग गुरु (Yoga Teacher ) होना जरुरी हैं।
उत्तर
आपको जीवन में योग आसन के अभ्यास के लिए आपको योग गुरु (Yoga Teacher ) के उचित दिशा निर्देशों का पालन करनाचाहिए।ऐसा इसलिए क्योंकि इंस्ट्रक्टर आपको बता सकता है की साधक की मानसिक और शारीरिक अवस्था (Medical condition) को देख कर कौनसे आसान और प्राणायाम उसके लिए उचित रहेंगे।
प्रश्न पतंजलि योगसूत्र में कितने सूत्र हैं।
उत्तर
- समाधि पाद – 51 सूत्र
- साधना पाद – 55 सूत्र
- विभूति पाद – 56 सूत्र
- कैवल्य पाद – 33 सूत्र
कुल मिलाकर: 195 सूत्र